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Palmistry Article Posted On : 12-02-2015
 

हथेली से जानें रोग

हस्त परीक्षण के द्वारा मनुष्य के रोगों की उत्पत्ति का आंकलन अपने-अपने तरीके से किया गया है। हथेली में कुछ विशिष्ट लक्षण पाए जाते हैं जिनकी सहायता से जातक के रोगों का पता चलता है कि अमुक व्यक्ति को इस लक्षण के कारण ये रोग होने की संभावना है। हथेली में पाए जाने वाले रोगो के लक्षणों का संक्षिप्त विवरण निम्न है। पर्वतों की स्थिति के अनुसार उत्पन्न होने वाले रोग : हथेली पर दृष्टि डालने पर हमें दो स्थितियाँ दिखाई देती हैं। एक स्थिति गड्ढेनुमा होती है तथा दूसरी स्थिति उभारनुमा होती है। इसके विपरीत कई बार उपरोक्त दोनों स्थितियों के अलावा न गड्ढेनुमा और न उभारनुमा, वह सामान्य स्थिति होती है। ये गड्ढेनुमा या उभारनुमा स्थिति ही पर्वतों का जन्म या उद्गम स्थान होता है। इसी क्रम में सर्वप्रथम हम गुरू पर्वत की स्थिति पर चर्चा करते हैं। चूंकि हमारा विषय रोग से संबंधित है, इसलिए गुरू पर्वत पर रोगों की पहचान किस प्रकार से की जाएगीक् इसका अध्ययन इसी क्रम में व्याख्या को बढ़ाते हुए करते हैं। गुरू पर्वत, जिसे हम बृहस्पति पर्वत भी कहते हैं। उससे संबंधित रोगों में प्रथम रोग पाचन-तंत्र की खराबी के कारण उपजता है क्योंकि गुरू प्रधान व्यक्ति खाने-पीने के बेहद शौकीन होते हैं। अत्यधिक खान-पान के कारण इनका पाचन-तंत्र खराब होने लगता है जिसके कारण पेट संबंधी रोग जैसे लीवर, सूजन, अपच इत्यादि उत्पन्न होते हैं। खानपान पर नियंत्रण नहीं होने से गुरू प्रधान व्यक्तियों का मोटापा बढ़ता रहता है जो कि कई रोगों को जन्म देता है। मधुमेह एवं अजीर्ण जैसी बीमारियों का अनुमान भी गुरू पर्वत से लगाया जा सकता है। गुरू प्रधान व्यक्तियों में सूजन की बीमारी भी बहुतायत में पायी जाती है। इस सूजन के कारण भी कई रोगों की उत्पत्ति होती है। यहां इस विषय का भी उल्लेख करना उचित रहेगा कि ये रोग गुरू पर्वत की खराब स्थिति होने पर ही उत्पन्न होते हैं। बृहस्पति प्रधान व्यक्तियों में पित्त प्रधानता अक्सर पाई जाती है। इसी प्रधानता के कारण इनमें गठिया होने की भी प्रबल संभावनाएं रहती हैं। इसके अतिरिक्त गुरू पर्वत के दूषित होने की अवस्था मूच्र्छा, यकृत तथा वायु संबंधी विकार या बीमारियों को भी जन्म देती है। उपरोक्त बीमारियाँ गुरू पर्वत के किसी भी प्रकार दूषित होने पर अधिकांशत: उत्पन्न होती हैं। हथेली में शनि पर्वत की स्थिति खराब होने पर कई बीमारियांँ उत्पन्न होती हैं। उनमें से प्रमुख बीमारी वायु विकार और गठिया हैं उपरोक्त बीमारियां गुरू पर्वत के दूषित होने की अवस्था में भी जन्म लेती हैं और शनि पर्वत के खराब होने की स्थिति में भी जातक पर प्रभाव डालती हैं, दोनों पर्वतों की स्थिति एक-दूसरे के पास होना भी इसका एक कारण है। यदि हथेली में शनि पर्वत की खराब स्थिति हो तो जातक के दुर्घटनाग्रस्त होने की अधिक संभावना रहती है। वह पुन: ठीक होेने में लम्बा समय लेता है अर्थात् सामान्य स्थिति से लम्बी अवधि के बाद ही ऎसा जातक बीमारी से मुक्त होगा तथा जातक में दुर्घटना का कोई चिन्ह या लक्षण अवश्य मिलेगा। जैसे कि उसकी चाल में लचक अवश्य होगी, भले ही वो ठीक हो गया हो। शनि पर्वत दूषित होने की अवस्था में दाँत की बीमारी, कान की बीमारी भी देखने को मिल सकती हैं। शनि पर्वत की बीमारियों की विशेषता यह है कि इसमें बीमारियाँ दीर्घावधि अर्थात् लंबी चलने वाली होती हैं। ऎसा जातक अन्य लोगों की तुलना में सामान्य जातक की अपेक्षा स्वास्थ्य लाभ में अधिक समय लेता है। ऎसे जातक को यदि खांसी हो जाती है तो ठीक होने में लंबा समय लेती है और वह आसानी से ठीक नहीं होती। ऎसे जातकों में कफ विकार या लकवा की बीमारी भी देखने को मिलती है जिसके कारण जातक चि़डचि़डा हो जाता है। कई बार तो बिना लकवे रोग के भी जातकों में, जिनके कि शनि पर्वत किसी भी प्रकार दूषित हो चि़डचि़डापन की स्थिति देखी जा सकती है। शनि पर्वत की दूषित अवस्था में जातक आत्महत्या जैसा कदम भी उठा जाते हैं। इसके अन्य कारणों के अलावा प्रमुख कारण यह होता है कि जातक बीमारी से इतना परेशान हो जाता है कि उसमें जीने की इच्छा समाप्त हो जाती है क्योंकि शनि पर्वत के दूषित होने की अवस्था में दीर्घावधि तक बीमारी घर कर लेती है और जातक में लंबी बीमारी से ल़डते रहने की मनोस्थिति नहीं रह पाती। शनि पर्वत प्रधान व्यक्तियों की नसों में सूजन भी देखने को मिलती है और ज्यादातर स्थितियों में जातकों के पैरों में कोई रोग अवश्य मिलता है। बहुत से अपंग लोग इसी श्रेणी में आते हैं। सूर्य प्रधान व्यक्तियों की खासियत यह होती है कि वे संतुलित होते हैं परंतु सूर्य पर्वत दूषित होने से यंू तो कई बीमारियाँ जन्म लेती हैं पर हमें अक्सर देखने को मिलेंगे ऎसे लोग जिनको नेत्र संबंधी बीमारी हो, ऎसे जातक कई बार अंधे तक हो जाते हैं या आँखों में विकार होना तो सामान्य बात है तथा जातक जरा सा भी श्रम करता है तो बहुत अधिक पसीने से भीग जाते हैं। ऎसे जातकों में लू लगने की बीमारी भी अक्सर देखने को मिलती है एवं जरा सी असावधानी से लू की चपेट में साथ ही तुरन्त बुखार की चपेट में आते हैं तथा अक्सर बुखार से पीç़डत रहते हैं। ऎसे लोगों में जिनका कि सूर्य पर्वत पीç़डत होता है उनमें जल की कमी होती है तथा जल की कमी के कारण इससे होने वाले रोग भी देखने को मिल सकते हैं तथा ह्वदय संबंधी बीमारी, पैरों में दर्द, मेरूदण्ड की बीमारी, क्षय रोग एवं मस्तिष्क की थकान भी इनमें देखने को मिलती है। जरा भी सोच-विचार से मस्तिष्क में थकावट तुरंत आ जाती है जो कि इनके चेहरे से झलकती है। बुध पर्वत दूषित होने पर अक्सर आप ऎसे जातकों को नींद नहीं आने की शिकायत करते हुए देखेंगे, हमेशा अनिद्रा की बीमारी के शिकंजे में अपने आपको ग्रस्त हुआ पाते हैं, गले के रोग बहुतायत में देखने को मिलते हैं। जैसे ही मौसम अपना रूप बदलता है अर्थात् मौसम परिवर्तन होता है तो ऎसे जातकों में गले संबंधी बीमारी उत्पन्न होती हैं। जरा सी खाने में असावधानी बरती और गला तुरंत खराब हो जाता है अर्थात् गले संबंधी बीमारी तुरंत घर कर लेती है। ऎसे जातकों में स्त्रायु विकार प्राय: देखने को मिलते हैं। स्त्रायु विकार के कारण जितने भी रोग होते हैं, दूषित बुध पर्वत वाले जातकों में वो देखने को मिल सकते हैं। मानसिक तथा म”ाा विकार, उदर विकार, मंदागिA संबंधी रोग जन्म लेते हैं। आम जिन्दगी में हम कई लोगों को शिकायत करते देखेंगे कि गृहिणी ने पाँच रोटियाँ बेलीं या चार बर्तन साफ किए और थकान ऎसी कि बीस किलोमीटर पैदल भ्रमण के बाद घर में प्रवेश किया हो अर्थात् थकान की समस्या में बुध पर्वत विशिष्ट भूमिका निभाता है। कई जातकों में वाणी संबंधी स्पष्टता नहीं होती। ऎसे में यह माना जाता है कि या तो इन जातकों की वाणी पर क्षेत्रीयता का असर है या इनकी वाणी खराब है परंतु कई बार इसकी स्थिति बिल्कुल ही विपरीत देखने को मिलती है। ऎसे में जातक की स्वर नली खराब तक हो सकती है। कई बार कई लोग बोल नहीं पाते वह भी स्वर नली की बीमारी का ही उदाहरण है। ये सभी रोग बुध पर्वत दूषित होने पर उत्पन्न हो सकते हैं। कई बार पित्त रोग एवं नाक संबंधी बीमारियाँ भी जातक में अन्य स्थितियों के अलावा बुध पर्वत दूषित होने के कारण भी देखने को मिलती हैं। मंगल पर्वत दूषित होने की अवस्था में जातक को रक्त संबंधी बीमारियाँ घेर लेती हंै। पित्त संबंधी रोग भी मंगल पर्वत दूषित होने के कारण पैदा होते हैं। मंगल पर्वत संबंधी रोगों में रक्त कैंसर व कंठ के संक्रामक रोग भी प्रमुखता से उभरते हैं। पेट में घाव होने संबंधी बीमारियाँ भी मंगल पर्वत के दूषित होने पर ही देखने को मिलती हैं। शुक्र पर्वत दूषित होने पर फेफ़डे संबंधी रोग तथा बुध पर्वत के साथ-साथ शुक्र पर्वत दूषित होने पर गले संबंधी रोग भी देखने को मिलते हैं। ऎसे जातक जिनका शुक्र पर्वत दूषित है उन्हें नशे की लत लगती है तथा प्रजनन संबंधी बीमारियाँ देखने को मिलती हैं। इनका प्रजनन तंत्र खराब तक हो जाता है या इससे संबंधित रोग देखने को मिलते हैं। मूत्र विकार की समस्या या रोग भी ऎसे जातकों में देखने को मिलते हैं। चंद्र पर्वत दूषित होने पर जल संबंधी रोग जातक में देखने को मिलते हैं तथा खून की कमी, मुख संबंधी रोग, पागलपन तथा क्षय रोग भी चंद्र पर्वत के दूषित होने पर ही अधिक उभर कर आते हैं। उपरोक्त वर्णित स्थितियाँ पर्वतों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं। कुछ जातकों में यह स्थिति जन्मजात पाई जाती है तथा कुछ लोगों में यौवन अवस्था में या वृद्धावस्था में उत्पन्न होती हैं। रोगों की तीव्रता पर्वत की दूषित अवस्था पर निर्भर करती है। यदि संबंधित पर्वत ज्यादा दूषित है तो रोग की तीव्रता उतनी ही अधिक प्रभावशाली होती है, कम दूषित होने की अवस्था में रोग ठीक होने की संभावना होती है। कम दूषित होने पर पर्वत विशेष की स्थिति पर एवं ग्रह संबंधित अनुकूल खानपान एवं उपचार पद्धति से रोग निदान संभव होता है। सामुद्रिक शास्त्र ज्ञान शास्त्र है जो कि अदृश्य को देखने में सहायक है। इस शास्त्र के नियमों का शास्त्रोचित अध्ययन व उपयोग कर, हम जातक के दैहिक, दैविक, भौतिक सुख-दु:ख, अभाव आदि का परिज्ञान कर, उसका सही मार्गदर्शन कर सकते हैं अथवा स्वयं अपना कल्याण कर सकते हैं। भारतीय विद्याओं को इसीलिए कल्याणकारी कहा जाता रहा है।

 
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Pages : 468
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