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Astrology Article Posted Date : 07-12-2011
 

वैदिक दर्शन का ब़डा चोर- स्टीफन हॉकिंग

Contd - 2
1. जितने भी प्राणी हैं, वे साँस क्यों लेते हैं और सबकी श्वसन प्रणाली एक जैसी क्यों
है।
2. समस्त प्राणियों की रक्त संचार प्रणाली एक जैसी क्यों है।
3. समस्त प्राणियों का जीवन-चक्र लगभग निर्धारित क्यों है।
4. भौतिक सृष्टि के अतिरिक्त समस्त प्राणियों के अंदर वह चेतना किसी न किसी रूप में क्यों रहती है।
5. जगत् के हर कण के अंदर एक स्मृति समूह होता है, वह अनन्त काल तक जारी रह सकता है, चाहे वह कण कितने ही पुनर्जन्म ले ले। इन स्मृतियों का भौतिक अस्तित्व से क्या संबंध है।
6. पुनर्जन्म की घटनायें पृथ्वी पर कहीं न कहीं मौजूद हैं। वे गत शरीर की स्मृतियों को साक्षात् करती हैं। स्टीफन हॉकिंग्स का कोई भी नियम इन घटनाओं की पुष्टि नहीं कर पायेगा।
7. गति, ऊर्जा व गुरूत्वाकर्षण बल अपने आप कैसे उत्पन्न हो गये बिना कारण के कोई घटना कैसे जन्म ले सकती है।
8. ऊर्जा क्षय क्यों नहीं होती है। सृष्टि को रूप बदल-बदल कर संचालित क्यों करती है।
9. कोई महान योजनाकार ही इस महान सृष्टि के नियमों का संचालक हो सकता है। वैदिक ऋषियों ने ऋत् नाम की एक व्यवस्था का उल्लेख किया है, जो ईश्वरीय सत्ता का संचालन पक्ष है।
10. इन सब तर्को का उत्तर किसी के पास नहीं है, ईश्वर को किसी ने नहीं देखा। ईश्वर को तर्क या गणित से ही सिद्ध किया गया है और हॉकिंग्स जैसे वैज्ञानिक गणित का भी सहारा नहीं ले रहे हैं। मानसिक कल्पनाओं व तर्क के सहारे ईश्वर के अस्तित्व को नकारने मे लगे हैं तथा माया के अस्तित्व को अपने कल्पना लोक के माध्यम से सिद्ध करने में लगे हैं। हम हॉकिंग्स के दिमाग के दिवालियेपन का खण्डन करते हैं। हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों ने सबकुछ वैदिक दर्शन से चुराया है। उनको अपनी कल्पनाओं के तर्क जाल के फ्रेम में गढ़ा है और दुनिया के सामने मनमाने ढंग से परोस दिया है। अगर हॉकिंग्स सृष्टि के रहस्य को समझ गये हैं तो अपनी आयु एक लाख वर्ष क्यों नहीं बढ़ा लेते। अपनी शारीरिक क्षमताओं को क्यों नहीं बढ़ा लेते। चार्वाक ने भी नास्तिकवाद का प्रतिपादन करके समस्त भारतीय दार्शनिकों को इस हद तक झकझोर दिया था कि कोई भी दार्शनिक अपनी धारणाओं का प्रतिपादन करने से पूर्व चार्वाक के नास्तिकवाद का खण्डन पहले करता है और अपने दर्शन का मण्डन बाद में करता है। हॉकिंग्स चार्वाक से कहीं अधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक हैं। वे अपनी पुस्तक "ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम" के माध्यम से संसार को समझा पाये थे कि सृष्टि का संचालन कोई महान योजनाकार ही कर रहा है। सृष्टि के रहस्यों को समझने की मानवीय सीमाओं से परे जाकर भी ईश्वर की माया को कोई समझ नहीं पाया है। उन्होंने मानव मस्तिष्क की सीमाओं से पार जाकर, जब ईश्वर के रहस्य तक नहीं पहुंच पाये तो उसे मानने से ही इंकार कर दिया है। मेरा मानना है कि हॉकिंग्स अपने शेष जीवन काल में ही सृष्टि और ईश्वर के परस्पर संबंध को मान्यता दे देंगे। अन्यथा कोई और वैज्ञानिक आयेगा और इस तथ्य की पुष्टि अपने किसी शोध के माध्यम से भविष्य में करेगा।
भारतीय दर्शन सृष्टि के त्रिआयामी होने के तथ्य को कभी भी मान्यता नहीं देते। चार या पाँच आयाम की चर्चा तो खुले आम होती है। जब ईश्वर या जीव को या आत्मा को सर्वव्याप्त, अनिर्वचनीय तथा निर्गुण माना है तो उसके अनन्त आयाम होना तर्क से सिद्ध होता है। शून्य से सृष्टि उत्पन्न हुई है और पुन: शून्य में विलीन हो जायेगी। ऎसा पुन:-पुन: होगा। हॉकिंग्स जैसे वैज्ञानिक इस तथ्य को कभी का स्वीकार कर गये हैं, परन्तु उस महाशून्य की परिभाषा कभी भी नहीं दे पाये हैं। हॉकिंग्स यह कभी भी नहीं कह पाये कि बहुत सारे ब्लैक होल मिलकर किसी दिन एक ही ब्लैक होल बन जायेंगे और वह किसी दिन महाशून्य में बदल जायेगा। पर हम भारतीय वाङग्मय में इस बात के प्रमाण पाते हैं कि ऎसा दिन महाप्रलय का दिन होता है। उस दिन ईश्वर सृष्टि के प्रलय, विलय और प्रारंभ का सूत्रपात करते हैं।
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