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Astrology Article Posted Date : 29-04-2014
 

कलश पूजन

    हमारे शाश्वत सांस्कृतिक संस्कारों में किसी भी मांगलिक या अन्य किसी कार्य के आरंभ में कलश पूजन एक अनिवार्य अनुष्ठान होता है। कलश पूजन के पीछे भारतीय मनीषी बहुत सारे रहस्यों को गर्भित किए हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि संसार की समस्त क्रियाएं इसी कलश रूपी रहस्यमयी शक्ति के चारों ओर चक्कर लगा रही हैं।
    कलश किसका प्रतीक है? :
    कलश पूजन के पीछे क्या अवधारणा निहित रही है, इस पर विचार करते हैं। भारतीय वाङ् मय और धार्मिक शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु की नाभि कमल से सृष्टि की उत्पत्ति हुई और कमल से ब्रह्माजी की। कलश में रखा जल, उस जल स्रोत का प्रतीक होता है जिससे यह सृष्टि बनी थी। एक अन्य शास्त्रीय दृष्टान्त में समुद्र मंथन के समय देव और असुरों के समक्ष अमृत से भरा कलश प्रकट हुआ, यही कलश, इस शाश्वत जीवन का प्रतीक था। ये तो कलश के शास्त्रीय धार्मिक आधार हैं।
    अन्यत्र यदि हम देखें तो यह कलश जलपात्र होता है और व्यावहारिक जगत में शुद्ध और पवित्र जल, मानव जीवन के संचालन के लिए अत्यन्त आवश्यक होता है। जल के बिना मनुष्य का जीवन असंभव हो जाता है। रहीम दास कवि ने तो यहां तक कह दिया कि
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुस चून।।

    अर्थात् पानी के बिना यह संसार सूना है। कलश पूजन के पीछे भारतीय संस्कृति की मूल भावना यह थी कि संसार में हम कुछ भी करें परन्तु वह जल के बिना संभव नहीं होगा, जल में अपार और असीमित शक्ति है इसीलिए भारत की संस्कृति मनुष्य को प्रत्येक मांगलिक आदि कार्यों से पहले जल की पूजा कराती है और अप्रत्यक्षत: यह संदेश देती है कि संसार में जल अमूल्य है। यह अमृत है, यह रस है, इसकी सदैव रक्षा करना, इसे बचाना, इसका मान-सम्मान करना, जल शक्ति की कभी अवहेलना मत करना। जल में यह गुण समाविष्ट है कि उसके सम्पर्क में आने से सब कुछ धुल जाता है। जल की संगति का अर्थ है, विकारों को पवित्र और निर्मल बनाना अत: कलश को उस शुद्ध जल का प्रतीक मानकर पूजा जाता है जो मनुष्य के जीवन को संचालित करता है, उसे विकार रहित, रसपूर्ण, शुद्ध, शांत, शीतल बनाता है। कलश पूजन में यह अभिप्रेत है कि जीवन में जब भी विकार उत्पन्न हों, क्रोधाग्नि बढ़े, आवेश आ जाए, मन निराश हो, अपवित्रता की मात्रा बढ़ जाए तब इस शुद्ध पवित्र जल का सेवन करना, इसके उपयोग से सभी प्रकार के विकार स्वत: धुल जाएंगे। कलश में उस दिव्य शक्ति का निवास माना गया है, जिसके केवल सामने रखकर पूजने मात्र से मनुष्य विकार रहित हो जाता है।
    हमने आरंभ में विष्णु भगवान के नाभिकमल से सृष्टि की उत्पत्ति का उल्लेख किया है और इस कलश को उसी नाभिकमल का प्रतीक माना जाता है जिससे जगत का सृजन और विकास हुआ है। क्या हम नहीं जानते कि नाभि कोई भी हो, वह आरंभ और अंत का कारक होती है। मनुष्य की नाभि ही लीजिए, जब मनुष्य गर्भ में होता है तो उसमें सर्वप्रथम नाभि के माध्यम से ही जीवनी शक्ति, रक्त संचार आरंभ होता है और यह नाभि माता की नाभि से जुड़ी होती है। कैसा अद्भुत खेल है प्राकृतिक ऊर्जाओं का, एक नाभि दूसरी नाभि से जुड़कर शक्तिपात करके सृजन करती रहती है। कलश पूजन इसी ब्रह्म ऊर्जा का प्रतीक है जिसके माध्यम से हमारे पूर्वजों ने हमारा ध्यान इसी ऊर्जा के अस्तित्व की ओर आकर्षित किया है। हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि हमें जीवनभर प्राकृतिक ऊर्जाओं से सामंजस्य बनाकर रखना होगा और उन्हें जीवन में उचित ढंग से प्रयुक्त करना होगा। कलश ऊर्जा का पिंड स्वरूप होता है, हमें ऊर्जा की संतुलित आवश्यकता होती है। कलश में हम यथेष्ट ऊर्जा का संग्रहण मानते हैं अर्थात् जगत में परिव्याप्त विशाल ऊर्जाओं की यथेष्ट मात्रा ही हमारे जीवनयापन के लिए पर्याप्त होती है, अत्यधिक ऊर्जा या शक्ति इसका दुरुपयोग कराती है या आक्रामक बना देती है।
    हम यहां वास्तु के एक रहस्यपूर्ण और अद्भुत सिद्धांत की चर्चा करना चाहेंगे कि नकारात्मक और विशाल ऊर्जा को वृत्ताकार या कुंभाकार रचना द्वारा रोककर, उसका सकारात्मक उपयोग किया जा सकता है। यही कारण है कि प्राचीन वास्तु ग्रंथों में मंदिरों के शीर्ष पर वृत्ताकार कलश, घरों में मेहराबें, कुएं और बावडिय़ों के वृत्ताकार पैंदे, वृत्ताकार मंडप या गुंबद आदि बनाए जाने के निर्देश हैं। इन्हीं ऊर्जाओं के मिश्रण के संग्रहीत पिंड को कलश पूजन का रूप दिया गया कि व्यक्ति आ रही असीम ऊर्जा का आह्वान कलश में करे और फिर जीवन में यथेष्ट प्रयुक्त करे। यहां हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कलश समष्टि ऊर्जा (macro energy) का व्यष्टि ऊर्जा (macro energy) स्वरूप है, जिसके बिना जीवन संघर्ष हो ही नहीं सकता है। भारत में प्राय: सभी मांगलिक कार्यों के आरंभ में कलश पूजन होता है। व्यक्ति को बारम्बार परमसत की असीम शक्ति की ओर संकेत कराया जाता है और उसे यह बताया जाता है कि ईश्वर का अंश यह ऊर्जा ही अब आपके जीवन संग्राम को चलाएगी।
    भारतीय संस्कृति में नवरात्रा स्थापन के समय घट स्थापना या कलश स्थापना की जाती है। इसी घट या कलश के समक्ष बैठकर नौ दिन तक मंत्र, यंत्र या तंत्र, जैसा भी व्यक्ति चाहे, साधना की जाती है। यह कलश या घट दैवी शक्ति का प्रतीक होता है। पुन: हम कलश स्थापना के माध्यम से ब्रह्माण्डीय शक्ति (universal energy) का आह्वान करके उसे आत्मसात करने की चेष्टा करते हैं और कई बार, कई साधक शक्तिपात करा पाने में सफल भी रहते हैं। उनमें कई गुणा शक्ति का संचार हो जाता है। उनके स्पर्श मात्र से दु:ख, कष्ट दूर होने लगते हैं, इसे माँ देवी की शक्ति कहा जाता है। कलश पूजन की परार्थ के लिए की जाने वाली यह विधि कलश स्थापना का अद्भुत संयोग है। कलश ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक है और उसमें ईश्वरीय शक्ति के सदुपयोग और परहित उपयोग की शर्त निहित रहती है। कलश पूजन के माध्यम से भारतीय संस्कृति व्यक्ति को सजग और सावधान करती है कि इस शक्ति या ऊर्जा का परार्थ और परहित में उपयोग करना है, स्वार्थ और दुर्भावनावश नहीं। यदि इस सकारात्मक ऊर्जा का दुरुपयोग किया गया तो दुष्परिणामों का प्रतिफल भी अवश्य भोगना होगा।
    कलश पूजन की महत्वपूर्ण संस्कृति के वैज्ञानिक रहस्यों के उद्घाटन में यहां यह भी उल्लेख करना समीचीन होगा कि मांगलिक और धार्मिक कार्यों में कलश पूजन के समय कलश को जल से भरा जाता है और जल के भरे जाने के कारणों पर हम ऊपर चर्चा कर चुके हैं परन्तु मृत्यु, जीवन का अंतिम महासत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता और भारतीय संस्कृति में मृत्यु के समय शवदहन के लिए जो अग्नि ले जाई जाती है, वह भी कलश में ही ले जाई जाती है और मानव का अंतिम संस्कार के समय भी ध्यान आकर्षित कराया जाता है कि जीवनभर इस कलश पात्र में जल भरकर पूजा कराई जाती रही है क्योंकि जल में जीवनी शक्ति है परन्तु अब अंतिम समय इस कलश में अग्नि रखकर इस दैहिक शरीर को भस्मीभूत करके पुन: व्यष्टि ऊर्जा को समष्टि ऊर्जा में भेजा जा रहा है। जीवन संग्राम का यही महासत्य है कि जिस ऊर्जा का कलश के माध्यम से आह्वान किया गया और उससे जीवन जिया, अब उसी कलश के माध्यम से इस जीवनदायी ऊर्जा का विसर्जन किया जा रहा है और व्यक्ति मानों अंतिम बार कलश पूजन की इस पराकाष्ठा पर कह उठता है-
    सांई मेरा कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
    तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर॥

    अस्तु कलश पूजन की भारतीय संस्कृति में जो महत्ता है, उस पर प्रकाश डाला गया है कि कलश पूजन (ब्रह्माण्डीय ऊर्जा) हमारे जीवन के आरंभ से लेकर अंत तक चलता है, यह आदि भी है तो अंत भी।


 
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