Home   I   About Us   I   Contact   I   FAQ's   I   Member Article
Read Jyotish Manthan
Home Astrology Article
Astrology Karma Kanda Vastu Remedial Astrology Feng-Shui
Astronomy Palmistry Spiritualism Prashna Shastra Ayurveda
Astrology Article Posted Date : 03-07-2014
 

सन्तान

पूत कपूत तो क्यों धन संचय! पूत सपूत तो क्यों धन संचय! सन्तान को लेकर प्राचीन भारतीय वाङ्गमय बहुत संवेदनशील है। कुछ स्मृतिग्रन्थों में विवाह का मुख्य उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति ही बताया गया है। कहा गया है कि पुत्र उत्पत्ति से हम पितृ ऋण से मुक्त होते हैं। पिण्डदान करने का अधिकारी या पिता के उत्तर कर्म करने का अधिकार भी पुत्र ही होता है। इस कार्य में कन्या सन्तति को कम महत्व दिया गया है। भारत की प्राचीन विधियों में मनुस्मृति या मिताक्षरा तथा दायभाग पद्धतियों में जो कि प्राचीन भारत के संविधान जैसा कार्य करती थी, में सम्पत्ति और विरासत को लेकर स्पष्ट निर्देश थे कि गृहस्वामी की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र ही कर्ता की भूमिका निभाएगा और समस्त कुटुम्ब की सम्पत्तियों इत्यादि के अधिकार और दायित्व उसी में निहित होंगे। इन सबसे पुत्र सन्तति का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया था। जिसको कर्ता घोषित करना होता था उसी को पगड़ी बांधी जाती थी। 1955 में भारतीय उत्तराधिकार कानून आने के बाद स्थितियाँ बदली हैं और कन्या संतति को भी पुरुष संतति के समान ही अधिकार प्राप्त हुए हैं। पगड़ी की रस्म तो आज भी लकीर के फकीर की तरह निभाई जा रही है परन्तु उत्तराधिकार कानून में कर्ता जैसे Concept को समाप्त जैसा ही कर दिया है और वह केवल इन्कमटैक्स विभाग की फाइलों में हिन्दू अनडिवाइडेड फेमिली (HUF) के रूप में तकनीकी दृष्टि से उपस्थित है और हकीकत में उसका कोई वजूद नहीं है। यही कारण है कि प्राचीन काल में पुत्र उत्पन्न करने के लिए व्यक्ति क्या-क्या नहीं करता था। ज्योतिषी और वैद्यों के चक्कर काटता था। साधु-संतों की शरण लेता था और सब तरफ से निराश होने के बाद ही किसी बच्चे को गोद लेने की बात सोचता था। सन्तान जन्म के लिए उत्तरदायी ग्रह - बृहस्पति को सन्तानोत्पत्ति के लिए स्थिर कारक माना जाता रहा, परन्तु जैमिनी ज्योतिष में जो भी ग्रह पुत्रकारक सिद्ध होता है वह अपनी दशा में पुत्र देने की स्थिति में होता है। जैमिनी ज्योतिष में यह विचित्र बात है कि ग्रहों में से कोई भी पुत्र कारक हो सकता है। आत्मकारक, अमात्यकारक, भ्रातृृकारक और मातृकारक के बाद पुत्रकारक का स्थान आता है अर्थात् चरकारकों में ऊपर से पांचवा। इससे ध्वनि आती है कि सम्भवत: जन्म लग्र से पांचवा भाव पुत्र कारक से सम्बन्धित है। पाराशरी ज्योतिष में पंचम भाव जो भी स्वामी होगा, वह पुत्र या सन्तान देने वाला होगा। इसका अर्थ यह भी हुआ कि अलग-अलग लग्रों में पंचमेश अलग-अलग ग्रह होंगे अत: कोई भी ग्रह सन्तान दे सकता है। चरकारकों में से पुत्रकारक और विंशोतरी पद्धति का पंचमेश, इन दोनों ही पद्धतियों में कोई भी ग्रह सन्तानकारक हो सकता है। जन्म लग्र के दृष्टिकोण से हर भाव का भी कारक होता है। इनमें पंचम भाव के कारक हमेशा ही बृहस्पति को बताया गया है। वैसे ब्राह्मण, गृह, धन, पीले वस्त्र, पीले अनाज, स्वर्ण, पीले पुष्प, पीले रंग के फल, पुखराज, मित्र, शहद, हल्दी, लावण्य, चीनी, भूमि, छत्र, यजन, अध्ययन और सत्कर्म का कारक बृहस्पति देव को बताया गया है। बृहस्पति : संस्कृत वाङ्गमय में बृहस्पति को गुरु कहा जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद में बृहस्पति को विराट पुरुष की प्रतिभा और वाणी बताया गया है। वृहत्त पाराशर होरा शास्त्र में बृहस्पति को विष्णु का वामन अवतार बताया गया है। जबकि विष्णु पुराण में इन्हें ब्रह्मा तक बता दिया गया है। कहीं-कहीं इन्हेें गणपति और आंगिरस से उद्धृत किया जाता है। ये देवताओं के गुरु या पुरोहित हैं। एक पुराण कथा के अनुसार -आंगिरस ने बृहस्पति को जन्म दिया, जो कि मानसिक शक्तियों के स्वामी और देवताओं के शिक्षक हैं। वो विज्ञान के भी स्वामी है। ऋग्वेद के एक उल्लेख के अनुसार वे आकाश में उत्पन्न हुए। इनके सात चेहरे हैं और सात किरणें। ऋग्वेद की एक ऋचा इनके द्वारा लिखी गई है। वे उसके मंत्र दृष्टा भी हैं। स्कन्द पुराण के एक उल्लेख के अनुसार उन्होंने एक हजार वर्ष तक शिव की आराधना की और उन्होंने एक ग्रह बना दिया। स्त्रियों की जन्म पत्रिका में बृहस्पति पुत्र और पति के कारक भी माने जाते हैं। वे विवाह के कारक भी माने गये हैं। धार्मिक कार्य, आस्तिक कार्य, कर्मकाण्ड और कानून से सम्बन्धित कार्य बृहस्पति के क्षेत्र माने गये हैं। शरीर में वसा पर बृहस्पति का अधिकार माना गया है। कर्मकाण्ड में बलि और हवि बृहस्पति के विषय रहे हैं। ज्योतिष के बहुत सारे योगों में सन्तानोत्पत्ति की चर्चा की गई है। सन्तान देने वाले कई ग्रह हो सकते हंै परन्तु उनमें प्रथम स्थान बृहस्पति का है, उसके बाद किसी भी पुरुष ग्रह को यह श्रेय जाता है। ग्रन्थों में मिलता है कि पंचमेश यदि पुरुष ग्रह के साथ स्थिति हों तो प्रथम सन्तान पुत्र होती है। ज्योतिष और आयुर्वेद के ग्रन्थों में पुत्र प्राप्ति के बहुत उपाय बताए गए हैं। इस विषय में आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी काफी कार्य किया है। विश्व विख्यात वैज्ञानिक एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लेण्डरम बी. सैटल्स ने हजारों अमेरिकी दम्पतियों पर परीक्षण किए और पाया कि स्त्री में अण्डा निकलने के समय से जितना करीब स्त्री गर्भ धारण करें उतना अधिक पुत्र उत्पन्न होने की सम्भावना बनती है। उन्होंने यह भी बताया कि गर्भ धारण के समय यदि स्त्री का योनि मार्ग क्षारीय माध्यम से युक्त होगा तो पुत्र तथा अम्लीय माध्यम से युक्त होगा तो पुत्री होने की सम्भावना बनती है। इस फार्मूर्ले को ज्योतिषी और आयुर्वेदाचार्य हजारों वर्षों पहले से ही जानते हैं और इसलिए मयूरपंख भस्म का प्रयोग करते आए हैं। तीज, त्यौहार और व्रत : कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अहोई अष्टमी कहा जाता है। यह व्रत पुत्र प्राप्ति के लिए और पुत्रों की रक्षा के लिए किया जाता है। शीतला अष्टमी का व्रत और उसकी पूजा सन्तान की रक्षा के लिए की जाती है। इसके अतिरिक्त वत्स द्वादशी जिसे बच्छ बारस भी कहा जाता है, का व्रत भी पुत्र प्राप्ति और पुत्र रक्षा के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं उस गौ का दूध पीती हैं जो बछड़े की मां होती है। गणपति और पुत्र प्राप्ति : पुत्र प्राप्ति के लिए सन्तान गणपति स्तोत्र - नमो स्तु गणनाथाय सिद्धिबुद्धियुताय च। सर्वप्रदाय देवाय पुत्रवृद्धिप्रदाय च।। गुरुदराय गुरवे गोप्त्रे गुह्यासिताय ते। गोप्याय गोपिताशेषभुवना चिदात्मने।। विभवमूलाय भव्याय विभवसृष्टिकराय ते। नमो नमस्ते सत्याय सत्यपूर्णाय शुण्डिने।। एकदन्ताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नम:। प्रपन्नजनपालाय प्रणतार्तिविनाशिने।। शरणं भव देवेश संतति सुदृढां कुरु। भवष्यन्ति च ये पुत्रा मत्कुले गणनायक।। ते सर्वे तव पूजार्थे निरता: स्युर्वरो मत:। पुत्रप्रदमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धप्रदायकम्।। हरिवंश पुराण : सन्तान प्राप्ति के लिए हरिवंश पुराण का पाठ बताया गया है। इसे यदि विधिपूर्वक किया जाए तथा सन्तान गोपाल स्तोत्र का भी पाठ एक वर्ष तक किया जाए तो पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। वर्जनाएं : जो पुरुष या स्त्री सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, आश्रम और अग्रि की ओर मुख करके मल-मूत्र त्याग करता है वह नपुंसक और बांझ होता है। अकारण फल-फूल तोड़ने वाला सन्तान क्षय को प्राप्त होता है। श्राप से सन्तान हानि : वृृहतपाराशार होरा शास्त्र में पूर्व जन्म शाप द्योतनाध्याय में ऐसे बहुत सारे शापों का वर्णन है जिसके कारण सन्तान का अभाव रहता है। पाराशर ने मैत्रेय को यह उपदेश देते समय बताया कि भगवान शंकर ने पार्वती को समस्त शापों का विवरण बताया है। इसके अनुसार-बृहस्पति, लग्रेश, सप्तमेश और पंचमेश यदि निर्बल हों तो सन्तानहीन योग होता है। यदि सूर्य, मंगल, राहु और शनि बलवान होकर पुत्रभाव में हों और बृहस्पति निर्बल हों तो सन्तानहीनता का योग होता है। पंचम भाव से मंगल और राहु का सम्बन्ध होने पर, लग्र से राहु और गुलिक का सम्बन्ध होने पर सन्तान का अभाव होता है। राहु जनित योग में स्वर्ण की नाग प्रतिमा बनाकर विधानपूर्वक पूजा करके गोदान, भूमि दान, तिलदान और स्वर्णादि दान करने से नागराज की कृपा से पुत्र प्राप्ति होती है और कुल वृद्धि होती है। पितृ शाप से 11 योग बनाये गये हैं जिनमें सन्तान का अभाव होता है। इन योगों में सूर्य और मंगल के दूषित होने से तथा शनि और राहु के प्रभाव से सन्तानहीनता आती है। यह योग कुल मिलाकर 11 हैं। पितृ शाप से मुक्ति के लिए गया श्राद्ध बताया गया है तथा ब्राह्मण भोजन और गोदान करना चाहिए। यदि कन्या हो तो कन्या दान भी पितृश्राप से मुक्ति का उपाय बताया गया है। मातृशाप से कुल मिलाकर 13 योग बनते हैं जिनमें सन्तान का अभाव होता है। इन 13 योगों में चन्द्रमा का दूषित होना सबसे प्रधान है। लग्र, पंचम और चतुर्थ भाव में पाप प्रभाव हो, इन भावों के स्वामी पाप अंशों में हों, छह, आठ, बारह भाव मंगल, राहु, सूर्य और शनि से दूषित हों तो इन 13 योगों में माता के शाप से पुत्र का अभाव बताया गया है। इस शाप से मुक्ति का उपाय सेतुबन्ध समुद्र में स्नान, लक्षगायत्री जप, ब्राह्मण भोजन और पीपल की 1008 प्रदक्षिणा बताई गई है। भ्रातृशाप से भी सन्तानहीनता के 13 योग बताए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से तीसरा भाव, नीच के बृहस्पति, लग्रेश और पंचमेश के दोष और इन सब पर पाप ग्रहों के प्रभाव सन्तान के अभाव का कारण माने गये हैं। मंगल भ्राता के कारक हैं अत: तीसरे भाव से उनका सम्बन्ध जोड़ा गया है। भ्रातृशाप से यदि सन्तान का अभाव चल रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करके चान्द्रायण व्रत बताया गया है। इसके बाद कावेरी और कावेरी ना होने पर गंगा आदि महानदी के किनारे शालिग्राम के सामने पीपल वृक्ष का रोपण करें और पूजन करें। पत्नी के हाथ से 10 गोदान कराएं और आम आदि फलों के वृक्ष सहित भूमि का दान करें तो निश्चिय ही पुत्र प्राप्ति होगी। मामा के शाप से भी पुत्र का अभाव बताया गया है। इन योगों में पंचम भाव में यदि बुध, गुरु, मंगल, राहु हों, लग्र में शनि हों तो मामा के शाप से सन्तान का अभाव होता है। यदि लग्रेश और पंचमेश शनि, बुध, मंगल के साथ पंचम भाव में हों तो मामा के दिए गए शाप से सन्तान का अभाव होता है। इसी तरह से पंचमेश अस्त होकर लग्र में हों, सप्तम में शनि हों और लग्रेश बुध से युक्त हो तो भी सन्तान का अभाव समझना चाहिए। इसी तरह से बारहवें स्थान के स्वामी के साथ चतुर्थेश लग्र में हों। चन्द्रमा, बुध, मंगल पंचम में हों तो भी यह योग होता है। इस दोष के शमन के लिए विष्णु भगवान की स्थापना, बावड़ी, कूप, तालाब आदि का निर्माण करावें या बांध बनवाना चाहिए, इससे पुत्र प्राप्ति होती है। ब्रह्म शाप से सन्तान हानि : यह सात योग उन अपराधों से बनते हैं जिनमें कोई व्यक्ति धन या बल के अहंकार में ब्राह्मणों का अपमान करता है। अगले जन्म में सन्तान हानि होती है इन सभी योगों में बृहस्पति पीड़ित रहते हैं। जैसे बृहस्पति की राशि में राहु हों और पंचम भाव में बृहस्पति हों या नवमेश पंचम में हों, अष्टम में गुरु, राहु-मंगल से युक्त हों इत्यादि-इत्यादि। इन सभी योगों में गुरु, राहु, शनि या मंगल से पीड़ित हैं या गुरु के पीड़ित होने के साथ-साथ राहु, मंगल इत्यादि का पंचम भाव पर पाप प्रभाव है। इन शाप से मुक्ति के लिए चान्द्रायण व्रत और तीन सन्तापन प्रायश्चित करने बताए गए हैं तथा दक्षिणा सहित गोदान और स्वर्ण सहित पंचरत्न दान और ब्राह्मण भोजन बताया गया है। पत्नी शाप से संतान अभाव : यह कुल मिलाकर 11 योग हैं। गत जन्म में किसी कारण से पत्नी को कष्ट देने के कारण कष्ट मिला हो तो इस जन्म में यह योग मिलता है और संतान का अभाव रहता है। इन योगों में सप्तमेश, शुक्र, बृहस्पति और पंचम भाव दोषित होते हैं और पाप युक्त होते हैं। पाराशर जी ने इस शाप से मुक्त होने के लिए कन्या हो तो कन्यादान बताया है। यदि कन्या नहीं है तो सोने की लक्ष्मी नारायण मूर्ति, 10 सवत्सा, गौ, आभूषण, वस्त्र, किसी ब्राह्मण युगल को दान करने से पुत्र होता है और भाग्य वृद्धि होती है। प्रेत शाप से पुत्र का अभाव - प्रेत शाप से संतान नहीं होने के पाराशर जी ने कुल मिलाकर 9 योग बताएं हैं। जो मनुष्य श्राद्ध का अधिकारी होगा और अपने मृत पित्तरों का श्राद्ध नहीं करता है तो वह मृत मनुष्य प्रेत होकर शाप देता है। अगले जन्म में वह श्राद्ध अधिकारी संतान का अभाव झेलता है। इन योगों में पंचम भाव में शनि, सूर्य संप्तम भाव में क्षीण चंद्रमा, लग्न भाव में राहु, गुरु हों तो या पंचमेश होकर शनि मृत्यु भाग में हों या लग्न मंगल और पुत्र कारक अष्टम में हो तो यह दोष होता है। इसी तरह के बाकी योग हैं। पाराशर जी ने इस दोष की शांति के लिए गया में पिण्डदान करना, रुद्राभिषेक, गाय दान, चांदी का पात्र या नीलमणी दान करना चाहिए। ब्राह्मण भोजन करने से मनुष्य को पुत्र की वृद्धि होती है। सन्तान की आजीविका वराहमिहिर प्रभृति ऋषियों ने कर्माजीव प्रकरण में बताया है कि दशम भाव में जो ग्रह हों उस ग्रह से सम्बन्धित क्षेत्र या व्यक्तियों से आजीविका होती है। इस क्रम में वे कहते हैं कि जन्म लग्र से दशम स्थित ग्रह अन्यथा चन्द्र लग्र से दशम स्थित ग्रह की प्रकृत्ति के अनुसार आजीविका का निर्धारण करना चाहिए। यदि इन तीनों लग्रों में से किसी के भी दशम भाव में ग्रह न हों तो जन्म लग्र से दशम भाव का स्वामी जिस नवांश में हों उस नवांशपति से आजीविका निर्णय करना चाहिए। यह तर्क केवल किसी एक भाव के लिए ही सत्य नहीं हो सकता बल्कि अन्य भावों के लिए भी सत्य होना चाहिए। इस तर्क के आधार पर हम पंचम भाव पर यही विधान लागू करके सन्तान की आजीविका क्षेत्र का निर्धारण कर सकते हैं। सन्तान की आजाविका - यदि चन्द्रमा या लग्र से दशम भाव में सूर्य ग्रह हों तो पैतृक सम्पत्ति का उपयोग जातक करता है। यदि चन्द्रमा हों तो माता से प्राप्त सम्पत्ति का उपयोग करता है या उससे लाभ प्राप्त करता है। यदि लग्र या चन्द्रमा से दशम में मंगल हों तो शत्रु को पराजित करने से सम्पत्ति इत्यादि का उपभोग करता है। यदि लग्र या चन्द्रमा से दशम भाव में गुरु हों तो भ्रातृ वर्ग से प्राप्त सम्पत्ति का उपभोग करता है। यदि दशम में शुक्र हों तो स्त्री से प्राप्त धन कर सम्पत्ति का उपभोग करता है। यदि दशम भाव में शनि स्थिति हों तो व्यक्ति सेवक वर्ग से धन प्राप्ति की योजना बनाता है। ऋषियों ने तो अपनी बात कह दी परन्तु उसे समझना जरूरी है। उपरोक्त जो नाते-रिश्ते बताए गए हैं वे व्यक्ति न होकर वर्ग हो सकते हैं। शनि से भृत्य या सेवक वर्ग अभिप्रेत है। मान लीजिए किसी नियोक्ता के पास चालीस कर्मचारी हैं, उनकी मदद से वह इतना कमाता है, जितना कि उनको वेतन देने के बाद भी काफी बच जाए तो इसमें दो तरह की आय हुई। एक तो सेवकों के माध्यम से आजीविका अर्जित की तथा दूसरी अपने कर्म-कौशल या विद्या-कौशल के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित की, तो दशमस्थ शनि ऐसा कराते हैं। नवांश विचार - पंचम भाव के स्वामी यदि मेष नवांश में हों तो शत्रु या विरोधियों से प्राप्त सम्पत्ति या लाभ से आजीविका रहेगी। इसके अतिरिक्त मंगल से सम्बन्धित जो भी वर्ग हो सकते हैं या मंगल जिन विषयों के नैसर्गिक कारक हैं उनसे सन्तान को धन प्राप्ति या आजीविका प्राप्ति हो सकती है। मंगल धातु, मशीनें, भूमि, आग्रेयास्त्र या अग्रिकर्म के भी कारक हंै। यह बात मंगल के अन्य नवांश वृश्चिक पर भी लागू होती है। यदि पंचमेश शुक्र के नवांश में हो तो अर्थात वृषभ या तुला तो स्त्री वर्ग से या शुक्र जिन वर्गों के नैसॢगक कारक हैं उनसे आय अर्जित होगी। शुक्र सौन्दर्य प्रसाधन, कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सुन्दर सज्जित वस्तुएं व कमनीयता के कारक हैं। यदि पंचमेश बुध के नवांश में हों अर्थात मिथुन या कन्या में तो या तो सहोदरों से, या स्त्री वर्ग से या मामा वर्ग से या युवा वर्ग से आजीविका अर्जित कर सकते हैं। बुध शिल्प शास्त्र के भी प्रवर्तक हैं और बुद्धिजीवी कार्यों से भी आजीविका अर्जित कराते हैं। बुद्धि-कौशल के जितने भी कार्य हैं तो बुध उनमें प्रभावी भूमिका रखते हैं अत: पंचमेश बुध के नवांश में होने पर सन्तान प्रतिभा और बुद्धि कौशल के बल पर आजीविका अर्जित करेगी, ऐसा माना जा सकता है। चन्द्रमा के नवांश में यदि पंचमेश हों तो माता वर्ग से प्राप्त सम्पत्ति से या चन्द्रमा के अन्य कारकत्व यथा भूमि, रत्न, दुग्ध, श्वेत वस्त्र इत्यादि से सन्तान आय अर्जित करेगी। यदि पंचमेश सूर्य के नवांश में हों तो राजकीय कार्यों से, शासक वर्गों से या पिता से प्राप्त सम्पत्ति या व्यवसाय से सन्तान की आजीविका रहेगी। यदि पंचमेश बृहस्पति के नवांश, अर्थात धनु या मीन में हों तो सन्तान की आजीविका के क्षेत्र विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान पर आधारित होंगे। बृहस्पति भ्रातृ वर्ग से या धर्म कार्यों से या वैदिक विद्याओं से या गुरु से प्रदत्त विशिष्ट ज्ञान पर आधारित कर्मों से आजीविका अर्जित करेंगे। बृहस्पति देव गुरु हैं और सन्तान से सलाह देने का कार्य भी करा सकते हैं। यदि पंचमेश शनि के नवांश में हों अर्थात मकर या कुम्भ तो सन्तान को शनि के वर्ग अर्थात भृत्य वर्ग से या शनि के अन्य कारकत्व यथा लोहा, तेल, भूमि, जीर्ण वस्तुओं इत्यादि से आजीविका अर्जन रहेगा। होरा ग्रन्थों में अन्य भावों को लेकर इस तरह का स्पष्टीकरण नहीं मिलता, परन्तु वराहमिहिर ने बृहत्तज्जाक में जो नियम दशम भाव के लिए बनाए हैं, वे ही नियम पंचम भाव के लिए लागू करके यह निष्कर्ष निकाले गए हैं।

 
  Other Articles
  नरेन्द्र मोदी का शपथ ग्रहण समारोह - मुख्य सम्पादक सतीश शर्मा का मत - यह मुहूर्त लग्न तो अच्छी नहीं।
  कलश पूजन
  वैदिक दर्शन का ब़डा चोर- स्टीफन हॉकिंग
  वैदिक दर्शन का ब़डा चोर- स्टीफन हॉकिंग
  Madanotsav v/s Valentines Day
Political Financial
Sports Films
Monthly Forecast
Shell from Astrological Ocean
Pages : 180
Price : 205
 
Home I  About Us I  Contact I  FAQ's I  Member Article
Political I  Financial I  Sports I  Films I  Monthly Forecast
Astrology I  Karma Kanda I  Vastu I  Remedial Astrology I  Feng-Shui I  Astronomy I  Palmistry I  Spiritualism I  Prashna Shastra I  Ayurveda
Exclusive for Month I  Celebrity Analysis I  Current Event
  © 2008 Jyotish Manthan. All rights reserved
www.pixelmultitoons.com  |  Privacy Policy  |  Legal Disclaimer